ध्यान में मन क्यों भटकता है? (Why Does the Mind Wander in Meditation?)
“ध्यान में बैठते ही मन कभी बचपन में चला जाता है, कभी भविष्य की चिंता में खो जाता है… ऐसा क्यों होता है?”
यह प्रश्न लगभग हर साधक का होता है — चाहे वह शुरुआत कर रहा हो या वर्षों से साधना में हो।
🧠 मन का स्वभाव — गतिशीलता (Restlessness is Natural)
मन की प्रकृति ही चलायमान (restless) है। वह सदैव किसी न किसी विचार, स्मृति या कल्पना में उलझा रहता है। जब हम उसे पहली बार स्थिर करने की कोशिश करते हैं — जैसे ध्यान में — तो वह और भी ज़ोर से भागता है।
इसे योग में “चित्त वृत्ति” (mental modifications) कहा जाता है।
❓ साधक का अनुभव:
"हर बार जब मैं ध्यान में बैठता हूँ, तो 5 मिनट भी नहीं बीतते कि मन मोबाइल की बातों, ऑफिस के तनाव और घर की उलझनों में उलझ जाता है। लगता है ध्यान मेरे बस की बात नहीं है…"
लेकिन जब इस साधक ने अनाहत नाद (Anahata Naad - unstruck inner sound) पर ध्यान देना शुरू किया, तो धीरे-धीरे मन स्थिर होने लगा — क्योंकि नाद मन को स्वाभाविक रूप से खींच लेता है।
📌 समाधान — नाद से मन को साधना
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ध्वनि को पकड़िए, विचारों को नहीं:
जब भी मन भटके, उसे gently नाद की ओर लौटाइए — जैसे माँ बार-बार बच्चे को गोद में लाती है। -
साक्षीभाव रखें (Witness Your Thoughts):
विचारों को रोकने की कोशिश मत कीजिए। उन्हें केवल देखते जाइए (just observe) — जैसे फिल्म देख रहे हों। -
स्थूल से सूक्ष्म पर जाएँ:
पहले सांस पर ध्यान केंद्रित करें, फिर धीरे-धीरे अनाहत नाद को सुनने की कोशिश करें। यह मन को ध्वनि के रेशों में बाँध देता है।
🔄 अभ्यास ही समाधान है
ध्यान कोई जादू नहीं है — यह एक प्रक्रिया है। जितना नियमित अभ्यास होगा, उतनी ही गहराई में मन शांत होता जाएगा।
याद रखिए: "मन को रोकने की नहीं, उसे सही दिशा देने की ज़रूरत है।"
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अगर आप जानना चाहते हैं कि ध्यान में भटकते मन को कैसे नाद के माध्यम से नियंत्रित करें, और इसे समाधि तक ले जाएँ, तो पढ़िए:
🕊️ अनाहत नाद से समाधि — ध्यान का सहज राजमार्ग
लेखक: निरन बोधी
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🏷️ Tags:
mind in meditation, wandering thoughts, Anahata Naad, नाद ध्यान, ध्यान में मन
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